Saturday, 29 June 2019

सारी नदियाँ रेत-रेत हैं / हरिनारायण सिंह 'हरि' के पर्यावरण और अन्य गीत

                                          सारी नदियाँ रेत-रेत हैं
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सारी नदियाँ रेत-रेत हैं
जल का नहीं पता है
कंठ-कंठ सब प्यासे-प्यासे
कितनी हुई खता है

कल-कल, छल-छल लोल लहर अब सपनों-जैसे लगते
कहाँ गयी हहराती धारा
अंतर हृदय उमगते

है भविष्य कैसा संतति का
चिंता रही सता है

मात्र नदी सुरसरि को समझा
गंगाजल को पानी
रिक्त-रिक्त होने की तबसे
है प्रारंभ कहानी

सूखे पेड़ करोड़ों-लाखों
मूर्छित हुई लता है

हम ऐसी संतान कि जिसको
कब चिन्ता पूर्वज की
हमें अंधेरी रात चाहिए
नहीं चाह सूरज की

नहीं भगीरथ अब आयेंगे
पीढ़ी रही बता है
...



हमने खुद ही खुद का काम तमाम किया 

चौर और पोखर को हमने भरभर कर 
महल-अँटारी,मॉलों का निर्माण किया 
काट-काट कर पेड़ और जंगल-झाड़ी
प्रकृति सुंदरी का भरसक अपमान किया

तब कहते हैं नहीं राह अब दिखती है
हमने जब खुद ही रस्ते को जाम किया

नदियों को बाँधा, जल को अवरुद्ध किया
गंदे नाले को उसमें ही गिरा दिया
बांट-बांटकर पानी ,लहरों को तोड़ा 
फिर उसको पाने को सबको भिरा दिया

तब कहते हैं शुद्ध नहीं जल मिलता है 
जब हमने ही सारा यह दुष्काम किया

लूट मची है, लूट-लूट घर भरते हैं
दोहन-शोषण सारा कुछ ही करते हैं
खाली-खाली बचा खजाना जब खाली 
खाली-खाली देख आह क्यों भरते हैं

अपना ही जब कृत्य खुदी के उल्टा है
कहते हैंं फिर ऐसा क्योंकर राम किया 



             उर्वशियां सब रूठ गईं, मैं अर्जुन बना रहा        

    उर्वशियां सब रूठ गईं, मैं अर्जुन बना रहा 
मेरे अंतर का संवेदन हरदम तना रहा 

बार-बार उनने की कोशिश मुझ तक आने की
नेह-पाश में मुझे जकड़कर मुझको पाने की 
रहा अभागा बनकर सब दिन, यह सब मना रहा
उर्वशियां सब रूठ गईं ,मैं अर्जुन बना रहा 

समझ न पाया उन दिन इसका मतलब क्या होता 
प्रेम-सरोवर में डूबे तो क्या पाता-खोता
संस्कार भी आड़े आया, साया घना रहा 
उर्वशियां सब रूठ गईं, मैं अर्जुन बना रहा ।

ढले उम्र में याद उन्हीं की आती रहती है 
वह कुरेद मन मेरे, हाय!सताती रहती है 
बासमती हिस्से में सबके, मुझको चना रहा 
उर्वशियां सब रूठ गईं, मैं अर्जुन बना रहा ।
.....
कवि - हरिनारायण सिंह 'हरि'
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Monday, 24 June 2019

काबू में जज़्बात करो / शायरा - पूनम खत्री

पूनम खत्री की ग़ज़लें



1
काबू में जज़्बात करो
सोच समझकर बात करो 

मुस्काओ हर आंसू पर
खुशियों की शुरुआत करो 

दीवाली तक क्यूं बैठें
रोज़ दिवाली रात करो 

जिन चीजों की लूट मचे
उनको ही खैरात करो 

बन जाओ शायर  'पूनम'
सारी मुश्किल मात करो


2

कमरा ख़ाली बिस्तर ख़ाली
तुम बिन दीवार ओ दर ख़ाली

रूठ गया मेरा रब मुझसे
मेरी झोली चादर ख़ाली

कुछ भी तो भरपूर नहीं है
अंदर ख़ाली बाहर ख़ाली

इक दिन करके जाना होगा
कोठी ख़ाली छप्पर ख़ाली

तन मन सब थक हार चुके हैं
'पूनम' अब कर दुनिया खाली।
...
कवयित्री - पूनम खत्री 
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"कहो न प्यार है" फिल्म के गीतकार इब्राहीम अश्क के साथ

साहित्यकारों के साथ

Friday, 31 May 2019

ऐ ईद क्यों तुम आ जाती हो / कवि - अमीर हमजा

कविता



ऐ ईद ऐ ईद क्यों तुम हर साल आ जाती हो
तड़पाती हो रुलाती हो मायूस कर के जाती हो.

न तन पर नया कपड़ा है
बस कहने को सब अपना है
मां बहलाती है फुसलाती है
खुद रोती है हमें भी रुलाती है

मां ने कहा था तीस रोज़े रखोगे
तो नया कपड़ा खुदा से पाओगे
मां कल तो चाँद रात है
न कपड़ा मिला न अब्बू मेरे साथ हैं
शहीद हो गए थे आतंकियों से लड़ते लड़ते

थक गया हूँ सरकार का आश्वासन सुनते सुनते
लोग बस मोमबत्तियां जलाते हैं फोटो लगाते हैं
किस हालात में गुजर रही जिंदगी पूछने नहीं आते हैं
इस साल ईद के मौके पर मेरे अब्बू नहीं आएंगे
हर साल की तरह अम्मी के लिए साड़ी चूड़ी नहीं लाएंगे

इसलिए ऐ ईद क्यों तुम हर साल आ जाती हो
तड़पाती हो रुलाती हो मायूस कर जाती हो.
....
कवि - अमीर हमज़ा
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Tuesday, 21 May 2019

हर तीरगी में घुस के चिरागाँ करेंगे हम / कैलाश झा किंकर की ग़ज़ल

ग़ज़ल-1




हर तीरगी में घुस के चिरागाँ करेंगे हम
बायाँ किया करेंगे वो दायाँ करेंगे हम।

सोये हुए थे चैन से अपनी लहद में जब
अबकी जगा दिया तो नुमायाँ करेंगे हम।

ज़ाहिर न होने देना तू अपनी खुशी कभी
सुन प्यार प्यार प्यार फ़ुरोजाँ करेंगे हम ।

उस्ताद तेरे काम को सबका सलाम है
दुनिया में तेरे नाम को याँ-वाँ करेंगे हम ।

वादा है तेरे साथ रहेंगे तमाम उम्र
शिकवे-गिले से भी न परेशां करेंगे हम ।
...



कवि - कैलाश झा किंकर
पता - क्रांतिभवन, कृष्णानगर,खगड़िया-851204
 मो0- 8825144942




    
   

Wednesday, 1 May 2019

चेन्नई में रह रहे हिन्दी कवि ईश्वर करुण की रचनाधर्मिता / कुमार सुशान्त

किन्तु शहर में किराये का मेरा घर /  इंतजार करता है /  मेरे खाली करने का !

कवि- ईश्वर करुण

यह बात सच है कि किसी भी लेखक की रचनाएं उसके समय का सच होती है क्योंकि लेखक जो समाज में देखता है उसे ही लिखता है। कोई भी लेखक अपने समाज से कटकर नहीं जी सकतायही बात ईश्वर करुण पर भी लागू होती है। ईश्वर करुण की कविताएं अपने समय का बयान है। उनकी कविताएं परिस्थितियों के दबाव से उत्पन्न हुई है । ये परिस्थितियाँ नई कविता और उसके बाद की है। नई कविता और उसके बाद के दशकों में बहुत ही ज्यादा सामाजिक परिवर्तन देखने को मिलता है। इसी कारण उनकी कविताओं में समसामयिकता देखने को मिलती है।  यह समसामयिकता ही उनकी संवेदनशीलता का प्रमाण है। उदाहरण के तौर पर जब सुनामी त्रासदी आई तो ईश्वर करुण का कवि भी इस घटना से प्रभावित हुए बिना न रह सका और उन्होंने सात दिनों में सात कविताएं लिख डाली। सुनामी से हुए जानमाल का नुकसान उन्हें अन्दर से हिला कर रख दिया। सुनामी पर २६ दिसंबर, २००५ को प्रातः ६:३० से ८:४० के बीच उनकी कलम से निकली पहली कविता का कुछ अंश देखें और जान-माल का जो नुकसान हुआ उसका अंदाजा लगाएं,

             "धरती हिली, समुद्र हिला,
               लहरें दौड़ पड़ीं किनारों को तोड़
               लील गयीं जो कुछ भी सुबह-सुबह मिला।
               धरती पर रह गये
               समुद्र के खिलाफ शिकवे ही शिकवे,
               गिला ही गिला..."१

सुनामी के बाद ईश्वर करुण को विश्वास नहीं हो रहा था कि सागर ने इतना बड़ा कहर बरपाया है। वे विस्मित थे। उन्होंने सागर को पाँचवी कविता (३० दिसम्बर, ०५ प्रातःकाल लिखी गयी। ) में उलाहना देते हुए लिखा है,

               " अजीब है सागर !
                  खाने के पहले डकारें लिये
                  और
                  पेट से फाजिल 'खाकर' भी शान्त !"२

 ईश्वर करुण की कविताओं का 'रेंज' बहुत बड़ा है । यही 'रेंज' उन्हें बड़ा कवि बनाता है। उन्होंने विविध विषयों पर कविताएं लिखी हैं। उनकी दृष्टि बहुत ही पैनी है। ऐसा लगता है मानो उनकी नजर से किसी भी विषय का बच पाना नामुमकिन है। ईश्वर करुण ने एक तरफ माँ, पापा, बेटी जैसे पारिवारिक रिश्तों पर कविताएं लिखी तो दूसरी तरफ सिल्क स्मिता और बेनज़ीर जैसी महिलाओं पर भी कलम चलाई। तीसरी तरफ उनकी नजर स्त्री विमर्श, नया वर्ष, भूख, राजनीति, कल्पना, विरह, चिन्ता और रात जैसे विषयों पर गई तो चौथी तरफ उन्होंने मौलिश्री, टहनी, पहाड़, नीलगिरी की बारिश जैसी प्रकृति से जुड़ी कविताएं भी लिखी। उनकी नजर से जंगल का फूल भी नहीं बच पाया । उन्होंने ऊटी के जंगल के फूलों पर भी कविता लिखी है। इस विषय पर लिखी कविता की कुछ पंक्तियां देखिए,

        "ऊटी जंगल के फूल
         उन्हें निर्जन में खिला देख
         हमें उनकी एकान्तिका पर
         आश्चर्य होता है
         हाय रे, मैं मूरख !
         यही तो उनकी दुनिया है
         हमें आश्चर्य है कि वे मेरी दुनिया में क्यों नहीं ?
         पर यह तो उनकी मर्जी
         मेरे आश्चर्य पर वे और खिल जाते हैं।
         उनकी मुस्कुराहट का दायरा बढ़ जाता है।"३

ईश्वर करुण बहुत ही संवेदनशील कवि हैं। संवेदनशीलता उनकी रचना धर्मिता को प्रगाढ़ बनाती है। उन्होंने जो भी अनुभूत किया उसे अपनी संवेदना के माध्यम से कविता के रूप में व्यक्त किया । अपनी संवेदना के बल पर कवि मध्यवर्ग से ही नहीं बल्कि निम्नवर्ग से भी जुड़ता है। 'कोयम्बत्तूर पहचान गया' कविता में उन्होंने लिखा है,
         "फुटपाथ पर शाम को खाते समय
         'परौठा' खाने का स्वाद
         थप्पड़ के स्वाद में क्यों बदल गया !
         वह थप्पड़ तो भूख से पीड़ित
         उस भिखारी के गाल पर पड़ा था !"४

 इस कविता में कवि निम्न वर्ग के भिखारियों से जुड़ते हैं और उनके दुख को अपना दुख समझते हैं।दूसरे के दुख को अपना दुख वही मान सकता है जो संवेदनशील हो।

ईश्वर करुण की संवेदनशीलता का एक और उदाहरण 'तर्पण' कविता में देखने को मिलता है जो एक बाप की मजबूरी का बयान है। इकलौता बेटा अमेरिकी स्वर्ग में पत्नी के साथ रहता है। बाप भारत में अकेला रहने को विवश है । घर में कोई नहीं है । बाप के भी माँ और पिता स्वर्गीय हो चुके हैं। बेटे और बहू से मिलने के लिए बाप घर में अकेले  छटपटाता है । अकेलापन उसे काटने को दौड़ता है लेकिन विवशता ऐसी कि उसे अकेले ही रहना है,

        "बेचारा  बाप
         ना माँ-बाप के स्वर्ग में जा सकता है,ना बेटे के स्वर्ग में
         ना माँ-बाप स्वर्ग से उसके पास आते हैं
         और न बेटा ही अमेरिकी स्वर्ग की परिधि लाँघता है
         साल में एक बार वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए
         बेटे से बात कर लेता है
         माँ-बाप को तर्पण देने समय !"५

यह हमारे आधुनिक जीवन की विडंबना है। लोग बूढ़े माँ-बाप को अकेले तड़पने के लिए छोड़ देते हैं और अपने सुख में मस्त हो जाते हैं । ऐसे लोग भूल जाते हैं कि कभी वे भी बूढ़े होंगे।

ईश्वर करुण की रचनाधर्मिता पर विचार करने से हम पाते हैं कि उनकी कविताओं में गत्यात्मकता और नव्यता है । कविता में प्रकृति का चित्रण हमेशा से ही होता रहा है लेकिन आज जब पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। प्रकृति को बचाने की चेष्टा की जा रही है। लोग 'ग्लोबल वार्मिंग' का शिकार हो रहे हैं । धरती का तापमान दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे विपरीत समय में प्रकृति के प्रति दुनिया को सचेत करने की जरूरत है। संवेदनशील कवि ईश्वर करुण की कई कविताओं में प्रकृति के प्रति चिंता व्यक्त की गयी है । उदाहरण के तौर पर 'मौलिश्री खड़ा है ?' कविता की कुछ पंक्तियों को देखिये,

               "मौलिश्री जिंदा हैं
                क्योंकि यह स्वयं मर भी नहीं सकता
                कंक्रीटों की अदालत से उसे मिला है मृत्यु दंड !
                उसे प्रतीक्षा करनी है जल्लाद की !
                जा आने ही वाला है
                नगर निग द्वारा जारी
                'मृत्यु वारंटलेकर !"

पेड़ों की बेतहाशा कटाई से खतरा केवल मनुष्य जाति पर ही नहीं आया है बल्कि पशु-पक्षियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है। कई पशु-पक्षी विलुप्त होने के कगार पर खड़े हैं। ईश्वर करुण के भीतर का कवि इस खतरे के प्रति सचेत है, नहीं तो 'आभार वनचिड़ैया' जैसी सुंदर कविता वे नहीं लिख पाते । इस कविता में वे वनचिड़ैया को दर्शन देने के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहते हैं,

             "आभारी हूँ उस वनचिड़ैया का
               जो मेरी कल्पना की सोनचिड़ैया को
               चुनौती दे गई है-
               मेरे सौंदर्य दृष्टि में बहुत कुछ जोड़ कर !"७

कवि को इस कविता में वनचिड़ैया का सौंदर्य सोनचिड़ैया से ज्यादा अच्छा लगता है । कवि को डर है कि आने वाले समय में वनचिड़ैया कहीं विलुप्त ना हो जाये और मनुष्य को केवल कल्पना की सोनचिड़ैया से ही काम चलाना पड़े।

'बगुले ने गांव नहीं छोड़ा' कविता में कवि गौरैया, बुलबुल, कौवे, चील, मैना, कोयल, बगुला आदि पक्षियों के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए कविता के अंत में राजनीतिक व्यवस्था पर ऐसा करारा चोट करते हैं कि पढ़ने वाला पाठक बिना तिलमिलाए रह नहीं पाता।,

           "कल का बगुला भगत ही
            अब गाँव का प्रतिनिधि रह गया है
            बच्चे 'चिड़िया' का पाठ उसी से पढ़ने लगे हैं।"८

नई कविता ने कविता की लयात्मकता को कम कर विचारात्मक बना दिया है। ऐसे समय में ईश्वर करुण की कविताएं छंदात्मक न होते हुए भी विशिष्ट लय से युक्त है । मेरी नजर में इसका कारण कवि का गीतकार होना है। उनकी 'उदगमंडलम् / नीलगिरि की बारिश' नाम कविता से लय की एक बानगी देखिए,

                           " दूर देश के लोग मगर,
                             बरसा को कोस रहे हैं
                             छोटी-सी औकात में हैं
                             और हाथी पोस रहे हैं,
                             बरसा है कि अपनी धुन में
                             बरस-बरस हँसती है
                             पेड़ों और और पहाड़ों की
                             बस्ती में वह बसती है।"९

रोजी-रोटी के चक्कर में गाँव से पलायन कर शहर में कमाने गए लोगों की विडंबना है कि उन्हें शहरों में किराये के मकान में रहना पड़ता है। उनके गाँव वाले घर में ताला लग जाता है । अपने घर में ताला लगाकर दूसरों के यहाँ किराये पर रहना उनकी मजबूरी होती है। मध्यवर्ग की विडंबना पर ईश्वर करुण ने 'किराये का घर' कविता में लिखा है,

               "आँगन हँसता है
                 देहरी हँसती है
                 और
                 हँसती है घर की दीवारें
                 जब मैं बरसों बाद भी
                 आता हूँ अपने घर !
                 किन्तु शहर में किराये का मेरा घर
                 नहीं हँसता, जहाँ रोज रहता हूँ !
                 वह तो इंतजार करता है
                 मेरे खाली करने का !"१०

 ईश्वर करुण अपने समाज के लिए कुछ कर गुजरना चाहते हैं । उनमें समाज बदलने का जोश मौजूद है जिसे वे कविताओं के माध्यम से व्यक्त करते हैं। इस भाव की अभिव्यक्ति उन्होंने 'प्रण' कविता में किया है,

                     "मैं अपनी आशाओं की
                      जली चिता के
                      कोयले घिस कर,
                      लिखूंगा---
                      गीत नव-निर्माण का।"११

 गाँव की संस्कृति और किस्सागोई से कवि को गहरा लगाव है । किस्सागोई में प्रवीण व्यक्ति जब शहर की भीड़ और जिंदगी की आपाधापी में खप जाता है एवं अपनी सहजता खो देता है तो कवि को दारुण दुख होता है।  'चोरे महथा' कविता में 'चोरे' नाम के ऐसे ही व्यक्ति का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है,

            "अब चोरे महथा
             किसी शहर में खो गया
             अब कोई चोरे महथा हुआ नहीं करता गाँव में........
             और न उसकी पीढ़ी ही बाकी है।
              चोरे महथा इतिहास का
              हिस्सा बन गया है..."१२

कवि का मानना है कि विज्ञान चाहे लाख तरक्की कर ले लेकिन कविता हमेशा रहेगी । मनुष्य को कविता के पास लौटना ही पड़ेगा। कविता कभी खत्म नहीं होगी । इसी भाव की अभिव्यक्ति कवि द्वारा 'कम्प्यूटर और कविता' नामक कविता में की गयी है,

        "कम्प्यूटर हमारे संचित ज्ञान को बाँटता है, किन्तु
          ज्ञान की मौलिक सर्जना के लिए
          तुम्हें आना ही पड़ेगा कविता के पास।"१३

ईश्वर करुण की कविताओं में वैविध्य देखने को मिलता है । अहिंदी भाषी क्षेत्र में रहते हुए भी हिंदी में कविता लिखना बड़ी बात है। उनकी कविताओं का कहन और बनक लाजवाब है। ईश्वर करुण की कविताओं को पढ़ते हुए पाठकों को ऐसा लगता है मानो वह कविताओं को पढ़ कम और जी ज्यादा रहा है क्योंकि उनकी कविता आम जन की कविता है। यही उनकी कविताओं की सफलता का राज भी है।

सन्दर्भ:
१. ईश्वर करुण, चुप नहीं है ईश्वर, बोध प्रकाशन, ३४-३५,
     वालटैक्स रोड, चेन्नई - ६०००७९, तमिलनाडु,
     ISBN : ९७८-८१-९०६२४४-७-३. पृष्ठ - २७.
२.   वही, पृष्ठ - २९.
३.   वही, पृष्ट - ३८.
४.   वही, पृष्ट - ५६.
५.   वही, पृष्ट - ४७.
६.   वही, पृष्ट - ९३.
७.   वही, पृष्ट - ५३.
८.   वही, पृष्ट - ५०.
९.   वही, पृष्ट - ५१.
१०. वही, पृष्ट - ७७.
११. ईश्वर करुण, पंक्तियों में सिमट गया मन, वंती प्रकाशन,
       मद्रास - ६०००२६, पृष्ट - ३२.
१२. वही, पृष्ट - ३५.
 १३. ईश्वर करुण, चुप नहीं है ईश्वर, बोध प्रकाशन, ३४-३५,
     वालटैक्स रोड, चेन्नई - ६०००७९, तमिलनाडु,
     ISBN : ९७८-८१-९०६२४४-७-३. पृष्ठ - ५५.
..................

समीक्षक - कुमार सुशान्त
समीक्षक का फोन नम्बर - 8961111747     
समीक्षक का पता -   कुमार सुशान्त,  17/2; रजनी कुमार सेन लेन, तल - द्वितीय, फ्लैट नंबर - 203
पोस्टऑफिस - हावड़ा, जिला - हावड़ा,  राज्य - पश्चिम बंगाल,  पिनकोड - 711101

समीक्षक - कुमार सुशान्त

Friday, 26 April 2019

बिटिया / प्रकाश रंजन 'शैल' की कविता

बिटिया


जीवन की मुस्कान बनेगी
मां का यह अभिमान बनेगी
कली खिली है इक प्यारी सी
बढ़ बगिया की शान बनेगी।

नन्ही सी महमान अभी है
घर-भर की यह जान अभी है
खूब पढेगी खूब बढेगी
पापा की पहचान बनेगी
कदमों मे हो दुनिया इक दिन
बढ़ बगिया की शान बनेगी।

कोयल सी आवाज निराली
दिखती कितनी भोली-भाली
आंखें इसकी इतनी सुन्दर
सपनों की उड़ान बनेगी
परी हमारी पंख सजा कर
बढ़ बगिया की शान बनेगी।

कोमलता से फूल लजाए
हंसे अगर तो गुल खिल जाए
घर की देहरी छोड़े जिस दिन
दुनिया की मुस्कान बनेगी
कली खिली है इक प्यारी सी
बढ़ बगिया की शान बनेगी।
....
कवि- प्रकाश रंजन 'शैल'
कवि का परिचय- कवि उच्च न्यायालय, पटना में सेवारत हैं.
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी  - prakashphc@gmail.com

कवि - प्रकाश रंजन 'शैल'

Friday, 19 April 2019

रश्मि सिंह के कविता संग्रह 'वैविध्य' पर किरण सिंह की समीक्षा

कितना हँसी है आज चाँद का सफर 


जीवन सफर में बहुत से उतार - चढ़ाव आते हैं जिन्हें तय करते समय हमारे मन वाटिका में तरह-तरह के भावनाओं के कुसुम पल्लवित और पुष्पित होते रहते हैं जिन्हें चुन - चुन कर लेखक - लेखिकाओं तथा कवि एवम् कवयित्रियों की मालिन लेखनी पिरोकर वर्ण माला का आकार देती है। कुछ यूँ ही कवयित्री रश्मि सिंह जी की लेखनी ने बहुत ही खूबसूरती से विविध प्रकार के शब्द सुमनो को चुन - चुन कर काव्य माला तैयार की है जिसका नाम है वैविध्य। 

रश्मि सिंह जी द्वारा रचित प्रथम काव्य संग्रह संग्रह का वैविध्य नाम वास्तव में उनकी रचनाओं के हिसाब से बहुत ही सटीक है क्योंकि इस संग्रह में मानवीय संवेदनाओं के विभिन्न पहलूओं पर बहुत ही सूक्ष्मता से प्रकाश डाला गया है। कवि मन तो संवेदनशील होता ही है जिसे कवयित्री ने अपने शब्दों में कुछ यूँ कहा है- "पीड़ा से बड़ा ही गहरा नाता है। संवेदनशील मन हमेशा ही प्रभावित हो जाता है। भूख, गरीबी, अनीति छोटी उम्र में ही कहीं गहरे पैठ गये"। 

सत्य है तभी तो कवयित्री ने अपनी पहली कविता निर्भया में प्रश्न किया है - 

मैं वैदेही बन वन को जाऊँगी 
पर क्या तुम राम बनोगे?

तो दूसरी कविता में मुक्ति का मार्ग तलाशती हुई लिखती हैं - 

तप में निरत रहे भागीरथ 
पुरखों का करने उद्धार 
तप से होकर द्रवित सुरसरि 
तारने आईं आर्यों के द्वार 
प्रबल वेग उन्मत्त हिरणी सी 

फिर कहीं जल बिन कल की कल्पना करती हुई अकुलाहट में लिखती हैं - 

जल विहीन भूमि पर 
कैसा होगा कल? 

तो कभी वृक्ष लगाने के लिए आह्वान करती हुई कहती हैं - 
आओ हम सब वृक्ष लगाएँ 
मेघों से छलके जल को 
जड़- जड़ तक पहुँचाएँ 

फिर जिंदगी को परिभाषित करते हुए लिखती हैं - 
नृत्य की भंगिमाओं में 
जीवन का अलंकार है जिंदगी 
सरिता की लहरों सा निरंतर 
प्रयास है जिंदगी 

तत्पश्चात नव दिवस को परिभाषित करते हुए लिखती हैं - 

नव दिवस नव बोध है 
आत्म शुद्धि का शोध है 

कहीं - कहीं तस्वीरों की खूबसूरती को बयां करती हुई कहती हैं -

आँचल के साये में सिमटे हुए 
सुकून को समेट लेती है तस्वीरें 

अपनी रचना नीयति में लिखती हैं - 

परागों से तिरता हुआ एक बीज छूटा 
वसुंधरा ने गढ़ दिया रिश्ता अनूठा 

तो कहीं कल्पना में चाँद का सफर करती हुई लिखती हैं - 
कितना हँसी है आज चाँद का सफर 

फिर कभी प्रिय की प्रतीक्षा करती हुई लिखती हैं - 
हर आहट पर दिल धड़कता है 
आओ या न आओ इंतज़ार रहता है। 

बेटी बचाओ अभियान के तहत लिखती हैं - 

ये नन्हीं कलियाँ हैं, इन्हें खिलने दो 
ये नन्हीं परियाँ हैं, इन्हें पुष्पित पल्लवित होने दो 

इतनी वेदनाएँ झेलने के बाद भी कवयित्री विश्वास का दीप जलाते हुए लिखती हैं - 

विश्वास विजित एक दीप जलाओ 
राम पुनः आयेंगे 

इतना ही नहीं वह हिन्द की सेना के साथ खड़ी होकर कहती हैं -

घोप दो खंजर दुश्मन के सीने में 
हौसले चाक कर दो 
गर भूल से देखे माँ भारती को
इरादे नापाक कर दो 

यूँ तो कवयित्री ने हृदय की हर भावनाओं को बहुत ही खूबसूरती से उकेरा है किन्तु अपनी माँ को समर्पित इस संग्रह में विशेष रूप से माँ के बारे में बहुत ही सुन्दर शब्दों से अलंकृत किया है।
यथा - 
माँ ओस का स्पर्श, साहस का हिमालय है 
इस भौतिकता के जंगल में, माँ धरती पर देवालय है। 

माँ सीप है मोती की तरह 
संजोती है अपनी प्रीत को 
नव कल्पना की तूलिका से रंग भरती 
अनगढ़े आलेख को 

और फिर अपना मातृधर्म निभाते हुए अपने पुत्र शिखर को आदेश देती हैं - 

शिखर नाम है शिखर पर रहो 
बड़ों को सदा मान देते रहो 

इस प्रकार कवयित्री ने अपनी रचनाओं के माध्यम से अपना कवि-धर्म बखूबी निभाया है। 
रचनाएँ छन्द मुक्त होते हुए भी तुकबन्द हैं इसलिए कविताओं में काव्यात्मक लय है जिसे पढ़ते पाठक को सुखद अनुभूति होगी। 

एक सौ सत्ताइस पृष्ठ के इस संग्रह में कुल एक सौ सात कविताएँ हैं जो सरल शब्दों में लिखी गई हैं। संग्रह का कवर पृष्ठ भी संग्रह के नाम के अनुरूप ही है। पन्ने उच्च कोटि के हैं तथा छपाई भी स्पष्ट है इस हिसाब से मूल्य भी 250 /रूपये मात्र ठीक ही है।

इस सुन्दर कृति के लिए मैं कवयित्री रश्मि सिंह को हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ देती हूँ और आशा करती हूँ कि आगे भी उनकी रचनाओं का संग्रह पाठक गण को पढ़ने को मिलता रहेगा । 

वैविध्य - काव्य संग्रह 
लेखिका - रश्मि सिंह
प्रकाशक - अयन प्रकाशन
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समीक्षक - किरण सिंह
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल- editorbejodindia@yahoo.com