Tuesday, 8 October 2019

अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच द्वारा डा. शिवदत्त शुक्ल स्मृति साहित्य भूषण सम्मान समारोह 5.10.2019 को सम्पन्न

श्रीहरि वाणी  एवं राधेकृष्ण चतुर्वेदी 'अबोध' को मिला सम्मान


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नवी मुंबई, 5 अक्टूबर 2019 की दोपहर में अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच एवं युवा कवि अरविंद पांडेय  के संयुक्त संयोजन में डा. शिवदत्त शुक्ल स्मृति साहित्य भूषण सम्मान समारोह ठाणे स्थित मराठी ग्रन्थ संग्रहालय के सभागृह में  सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम के आरम्भ होने पर सरस्वती वंदना आंभा दवे ने की। फिर मंच की अध्यक्ष अलका पाण्डेय ने मंच का परिचय व स्वागत भाषण दिया और घोषणा की आने वाले समय में दो की जगह तीन लोगों को शामिल किया जायेगा जिसमें महिला और पुरुष दोनों साहित्यकारों का सम्मान होगा
।
 प्रमिला शर्मा जी के सुंदर संचालन में दूसरे साहित्य भूषण सम्मान को शानदार ढंग से संचालित किया। समारोह की अध्यक्षता पंडित किरण मिश्र (वरिष्ठ गीतकार), मुख्य अतिथि हरीश पाठक (वरिष्ठ पत्रकार एंव कथाकार),  विशेष अतिथि मुरलीधर पाण्डेय (वरिष्ठ साहित्यकार), अभिलाष अवस्थी (वरिष्ठ पत्रकार) एवं मुख्य वक्ता पवन तिवारी (युवा साहित्यकार) रहे।

दूसरे साहित्य भूषण सम्मान- 2019 कथाकार, पत्रकार हरीश पाठक, वरिष्ठ गीतकार किरण मिश्र के हाथों वरिष्ठ पत्रकार अभिलाष अवस्थी, वरिष्ठ साहित्यकार  मुरलीधर पांडेय, युवा साहित्यकार पवन तिवारी की मंच की अध्यक्षा अलका पाण्डेय की उपस्थिति में सम्मान मूर्ति श्रीहरि वाणी  एवं राधेकृष्ण चतुर्वेदी "अबोध"  को प्रदान किया गया । इस अवसर पर दोनों विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर मुख्य वक्ता - पवन तिवारी ने श्रीहरि वाणी और  राधेकृष्ण 'अबोध' के व्यक्तित्व व कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। तदुपरांत सभी अतिथियों ने सम्मान मूर्ति द्वय के व्यक्तित्व पर अपने विचार रखे।

इस अवसर पर महानगर के अनेक साहित्यकार, पत्रकार, कवि एवं बुद्धिजीवी उपस्थित रहे जिनमें विशेष रूप से रामप्यारे रघुवंशी, अनिल गुप्ता, नीरजा ठाकुर, आभा दवे, रश्मि नायर, शिल्पा सोनटके, अनिता रवि - अलका रागिनी, हरेम्ब तिवारी, विधु भूषण, शिव प्रकाश जौनपुरी, दिनेश बैसवारी, आनंद मिश्र, अजय शुक्ल, संदीप पाटील, किसान तिवारी, अविनाश सूर्यवंशी, आशीष कुमार, ओम प्रकाश सिंह उपस्थित रहे। समारोह के अंत मे अंरविद पाण्डेय ने सबका आभार व्यक्त किया ।
.....

आलेख - अलका पाण्डेय
छायाचित्र - अ.भा. अग्निशिखा मंच
प्रतिकिर्या हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com





Thursday, 19 September 2019

एक फ़ौजी के बॉर्डर पर चले जाने के बाद / कवयित्री - सीमा सिंह, मुम्बई विश्ववि.

फौजी से आशिकी और मुहब्बत 
कविता 

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एक फ़ौजी के बॉर्डर पर चले जाने के बाद
शक्तिविहीन मुस्कुराहट के साथ जीते हैं
माता-पिता, भाई-भाभी, घर के बच्चे और इन सबके अलावा भी
कहीं बंद कमरे में सिसकती है
उनकी शरीक-ए-हयात।

दोनों ने क्या खूब मोहब्बत की
है मीलों की दूरी और
बिना नेटवर्क बातें अधूरी
एक दूजे को याद कर 
कर लेते हैं दोनों ही
अपने दिल की बात 
एक फ़ौजी के बॉर्डर पर
चले जाने के बाद

खुद से गिले-शिकवे करती हैं
पिछली बार का किस्सा
अब भी मुझे याद है
सिक्किम के पहाड़ों में
मुझसे बात करने के लिए
मीलों चल कर बर्फ़ीले तूफ़ान में
आपका बर्फ़ होना कमाल है
आपकी आशिकी और मुहब्बत मुझसे बेशुमार है

इस बार वादा किए थे घर आ जाएँगे आज
सुबह से शाम और शब गुज़र गई
न मैसेज कोई आया
न आपके नाम की रिंग बजी
मैं इंतज़ार करती रह गई
और नहीं आए आप..
वाकिफ़ होंगे आप ही
कहीं बंद कमरे में सिसकती है
आपकी शरीक-ए-हयात।

बॉर्डर पर ड्यूटी में तैनात
फ़ौजी के दिल से भी
आती है ये सदा

इक खुद से ग़िला बाक़ी रहा
दुनिया को छोड़ सिर्फ़ तुमसे मैं वाकिफ़ रहा
है तुम्हें क्या इल्म मिरे साहिब
महफ़िल में रह कर भी
तुम बिन मैं तन्हा ही तन्हा रहा

तुम्हीं न कहती थी
फौज़ी से मोहब्बत है
दूँगी साथ चाहे जो हो हालात
यही सेना की ड्यूटी है
ज़ीरो मिनट में हो जाना है तैयार
हम जानते हैं
कहीं बंद कमरे में सिसकती होगी
 हमारी शरीक-ए-हयात।

अबकी छुट्टी मंजूर हो गई है,
ज़रूर आएँगे हम, थोड़ा और 
इंतज़ार, इंतज़ार, इंतज़ार...
.....

कवयित्री - सीमा सिंह
पता - शोधार्थी, मुम्बई विश्ववि., मुम्बई
कवयित्री का ईमेल - seema16phd@gmail.com
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Monday, 16 September 2019

रोटी का सवाल है / कवयित्री - अंकिता साहू, इलाहाबाद विश्ववि. (उ. प्र.)

क्योंकि ये रोटी का सवाल है
कविता

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होना चाहता हूं स्वतंत्र
पर ग़ुलाम हो गया खुद का मैं
क्या करूँ ये गलती नहीं मेरी
रोटी का सवाल है।

बनना चाहता हूं कलाकार
पर खेल रहा हूं लोहे के औजारों से
क्या करूँ मर्ज़ी नहीं मेरी
ये तो रोटी का सवाल है।

खोद रहा हूँ गड्ढा
पाट रहा हूँ रचनातमकता
उगा रहा हूँ धन के पेड़
काम नहीं है ये मेरा
पर क्या करू रोटी का सवाल है।

सपनो की फटी कथरी पर
जरूरत की खोल चढ़ा रहा हूं
अपनी नैसर्गिकता पर नौकरी की चादर चढ़ा रहा
क्या करूँ नियति नहीं ये
रोटी का सवाल है।

जानता हूं कि कृतियाँ पेट नहीं भर पाती
नही लड़ पाती परिस्थितियों से
हो जाती है नतमस्तक भविष्य की मांगों के आगे
इसलिए कर रहा हूं मजदूरी
क्योंकि ये रोटी का सवाल है।
...
कवयित्री - अंकिता साहू
पता - इलाहाबाद विश्ववि. (उ.प्र.)
कवयित्री का ईमेल - sahu49206@gmail.com
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Wednesday, 4 September 2019

इश्क की चुस्कियाँ / कवयित्री - अंकिता साहू, इलाहाबाद विश्वविद्यालय (उ.प्र.)

कविता

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सुनो न!
चलो फिर से दिल की अदला बदली करते हैं
पर, कुछ सौदेबाजी के साथ!

तुम अपना अहम रोज़ शक्कर की तरह चाय में घोल देना
और मै अपनी नाराज़गी टी बैग की तरह
फिर दोनों साथ में गर्म इश्क़ की चुस्कियां लेंगे।

अपनी व्यस्तता को तुम जरा खूंटी में टांग देना
 मैं गुस्से को झटक कर कूड़ेदान में फेक दूंगी
फिर दोनों साथ में घर को खुशियों से सजा देंगे।

तुम अपनी परेशानियों की बाहें मेरे गले में डाल देना
मै अपने गम के आंसुओ को तेरे सीने से लगा दूंगी
फिर दोनों साथ में उस के आलिंगन का मज़ा लेंगे।

तुम अपने 'मैं' के हथौड़े को घर से बाहर फेंक देना
मै अपने गुरूर की कील दीवार से उखाड़ दूंगी
फिर दोनों साथ में 'हम' की एक सुंदर तस्वीर सजाएंगे।
...
कवयित्री - अंकिता साहू
इलाहाबाद विश्ववि. (उ.प्र.)
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com


Sunday, 25 August 2019

एक सच / कवयित्री - सीमा सिंह, मुम्बई विश्वविद्यालय

कविता

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सुनो अब हमारे खिलाफ़ एक और  दुश्मनी मोल ले लो तुम
कागज़ पर उकेरने जा रही हूँ तुम्हारा एक सच
हाँ तुम वही हो
जो हमें हमारे कपड़ों की वजह से नही
बल्कि एक स्त्री  होने के नाते
भरी भीड़ में भी
स्तन से जाँघों तक घूर लेते हो 
हमें भी अपने जैसा एक इंसान नहीं बल्कि
माँस के टुकड़े समझ झपटने की लोभी कोशिश कर लेते हो तुम
ना देखी हमारी उम्र, ना देखी हमारी सीरत,
बस एक मांसल देह मसलने के जुनून में
आँचल के चिथड़े कर जाते हो तुम
बस इतने पर ही खत्म नहीं होती पहचान तुम्हारी
उफ़्फ़..
ज़रा सब्र तो करो

तुम एक बार विशीर्ण कर देते हो हमारे शरीर को
औऱ अदालत की तरह  बना हुआ तुम्हारा ये समाज
ताउम्र हमारी सुनवाई लगाने को
हर पल नए ठहाकों  की महफ़िलें सजवाता है
जिसमें अपने सुकर्मों को ब्यौरा देकर
रौनकें दमका जाते हो तुम

सुनो 
अब एक ग़लतफ़हमी में जी रहे हो तुम
क्योंकि रौंदते हो तुम बस हमारे शरीर के हाड़-मांस को
पोर-पोर छलनी करते हो तुम बस इसके हर एक चाम को

लेकिन
हम में बसे आत्मदेह मनोबल और संबल को विदीर्ण करने के लिए
अब भी सरापा अपाहिज  हो तुम
...

कवयित्री - सीमा सिंह
पता -हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय
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Monday, 12 August 2019

"नई धारा" के वर्ष 2019 के साहित्य पुरस्कार - नरेश सक्सेना (जन्म - ग्वालियर,म.प्र.) को उदयराज सिंह सम्मान एवं श्यौराज सिंह बेचैन, देवशंकर नवीन तथा राजकमल को नई धारा सम्मान


"नई धारा" पिछले 70 वर्षों से प्रकाशित हो रही एक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका है जो प्रतिवर्ष देशभर के साहित्यकारों में चार का चयन करती है  इस बार पुरस्कार पानेवालों में  उदयराज सिंह स्मृति सम्मान (1 लाख रुपये) पेशे से इंजीनियर रहे नरेश सक्सेना तथा 25-25 हजार रुपयों के नई धारा सम्मान पानेवाले दलित लेखक श्यौराज सिंह 'बेचैन', देवशंकर नवीन तथा राजकमल हैं. जहाँ नरेश सक्सेना का जन्म ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में हुआ था वहीं देवशंकर नवीन बिहार में तथा अन्य दो उत्तर प्रदेश ने जन्म लिया है. विशेष जानकारी दूसरे चित्र में नीचे उपलब्ध है.
...
- बेजोड़ इंडिया ब्यूरो
(समाचार की पुष्टि व्हाट्सएप्प नम्बर 09334333509 से की गई है.)
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Saturday, 3 August 2019

मनु कहिन (7) - जीवन चक्र

जीवन चक्र 

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अरे भाई ये कल की ही तो बात है! कल तक खेलते कूदते, जमाने से बेपरवाह, व्यावहारिकता से कोसों दूर, खुद स्कूल जाते जाते कब कालिज में पहुंच गए पता ही नही चला। थोड़ा दौर बुरा था।यह वो दौर था जब स्कूल कालेजों में पढ़ाई का स्तर गिरना शुरू हुआ था। आगे की राह कितनी कठिन होने वाली थी, अंदाजा न था। खैर! पढाई खत्म होते होते एक बड़े, बहुत ही बड़े कैनवास के हिस्सा बन लिए। 

भाई ! एक अदद सरकारी नौकरी लग गई। समय बड़ी तेजी से पंख लगा कर उड़ रहा था। ये वो समय था जब आपको समय के साथ साथ संतुलन बैठाते हुए अपने आप को आगे बढ़ाना था। पर, शायद परिपक्वता नही आई थी। जो मिल गया उसे ही मंजिल समझ बैठे। आज की राजधानी एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर एक से छूट चुकी थी। जाहिर है, अब तो कल ही मिलेगी। अगले जन्म का इंतजार रहेगा। व्यक्ति हमेशा भविष्य में ही जीता है। भूतकाल पीछा नही छोड़ता है और वर्तमान स्वीकार नही कर पाता है। भाई, प्रारब्ध है ये। करना ही पड़ेगा। चंद्रयान कक्ष में स्थापित हो चुका है।

नौकरी के बाद जैसा कि अक्सर होता है। शादी हो जाती है। कुछ दिनों की मस्ती फिर जिम्मेवारियों का बोझ अब बढ़ना शुरू हो जाता है। दवाब कब तनाव में तब्दील हो जाता है। अब अहसास हो चला था। बच्चों की परवरिश, उनकी पढ़ाई,  समय पंख लगा कर उड़ चलाथा। हम प्रत्येक क्षण आगे बढ़ते जा रहे थे। बहुत कुछ पीछे छोड़ते हुए। समाज परिवार! कुछ तो ऐसे छुटे कि जिनकी अब यादें ही शेष हैं। काश वो दिन लौट कर आ पाते। बचपन में तारों को दिखाकर मां बताया करतीं थी, वो देखो वहां हैं सभी। यह सब लिखते हुए कब कोर भींग गए पता ही नही चला। 

परेशानियों, दवाबों और तनावों के बीच बहुत कुछ पता नही चलता है। बच्चे कब बड़े हो जाते हैं। कब वे अपना रास्ता चुन लेते हैं। बिल्कुल पता नही चलता है। शुरुआत में सब अच्छा लगता है। बदलाव कब और किसे बुरा लगा है भला! पर, देखिए आप फिर से अकेले हो गए। अब तो आपके दोस्त भी नही रहे सब कुछ छूटता जा रहा है। 

आप कब शर्मा जी और शर्मा साहब हो गए। आप तो आप रहे ही नही। आप तो सिर्फ़ किरदार निभाते रहे। किरदार निभाते निभाते कब आप बदल गए खुद आप नही जान पाए। देखिए साहब आप तो एक बेहतरीन अभिनेता हो गए। पर, साहब निर्देशक तो कोई और है। आप अभिनय करते रहते हैं पर, आपको जीवनभर निर्देशक का पता नही चलता है। ढूंढते रहते हैं हम सभी।यही तो जीवन है। यही सच्चाई है मेरे दोस्त। मान लें। दुबारा कुछ नही मिलना है। और जो मिल चुका है, उसे जाना भी नही है। 
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आलेख - मनीश वर्मा
लेखक का ईमेल आईडी - itomanish@gmail.com
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