Saturday, 16 May 2020

One Day / Poet - Dr.Paramita Mukherjee Mullick

Poem

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One day all wars will cease.
All around there will be joy and peace.
 
One day all terrorism will stop.
No guns will boom, no bombs will be dropped.
 
One day all trees will bloom.
There will for everybody be room.
 
One day there will be love and love all around.
All will be brothers and brotherhood abound.
 
One day there will be no poverty, no pain.
Everybody will have food, medication and happiness will reign.
 
One day all hatred will end.
There will be no foes, all a friend.
....
Poet - Dr. Paramita Mukherjee Mullick
Email ID  of the poet - mukherjeeparamita@hotmail.com 
Email ID of this blog for feedback - editorbejodindia@gmail.com


Thursday, 7 May 2020

हे सखी तुम्हरे मिलन को / कवयित्री - विनीता मल्लिक

गीत

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बारिश की नन्ही बून्दे
भीगा गयी मेरे तन को
पर मन अब भी  प्यासा है
हे सखी  तुम्हरे  मिलन को ।

घनघोर घटा जब छाती है 
तेरी याद नई कर जातीं हैं 
कोयल कूके, नाचे मयूर
पर यह मन तरसता है 
हे सखी तुम्हरे  मिलन  को।

दूर मिले क्षितिज और व्योम
सूरज शीतल जैसे सोम
पुलकित सबका रोम रोम
 मम हृद् पिघले जैसे मोम
हे सखी तुम्हरे  मिलन  को ।

सौंधी सुगंध  लाई बहार
गरज दामिनी लाई फुहार  ,
नव पल्लव बौर भी  झंकृत
मेरे मन वीणा की तारें विकल
हे सखी तुम्हरे मिलन को ।

जाने कब  सिमटेगी दूरियाँ
क्या करूँ  घटे मजबूरियाँ
हर क्षण ऐसा सोच सोच के
मन को बेधे घड़ी की सूईया
हे सखी तुम्हरे मिलन को ।

एक-एक पल पहाड़  लगे हैं
डरावनी अब मल्हार लगे हैं
श्रृंगार वस्त्र तक लगे चिढाने 
मन विकल चीत्कार  कर रहे
हे सखी तुम्हरे  मिलन को । 
कवयित्री - बिनीता मल्लिक
ईमेल आईडी - binitamallik143@gmail.com
पता - नई दिल्ली 
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com




Sunday, 3 May 2020

पान सिंह तोमर - एक फिल्म समीक्षा

गुस्से के होते हैं कई-कई रूप

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फ़िल्म समीक्षा
फ़िल्म-पान सिंह तोमर
कलाकार-इरफान खान, माही गिल, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी
निर्देशक-तिग्मांशु धूलिया

कहानी चंबल के बीहड़ की है जहाँ का पान सिंह तोमर रहने वाला है।पान सिंह तोमर अपना साक्षात्कार एक पत्रकार को दे रहा है।कहानी फ्लैस बैक में चलती है।पान सैनिक रहता है किंतु वह बहुत तेज धावक है।इसके तेज दौड़ने की चर्चा धीरे धीरे होने लगती है। 1965 ई में जब भारत पाक युद्ध होता है तो उसे युद्ध में शामिल नहीं होने दिया जाता है जिसका पान को बहुत मलाल रहता है । इसका गुस्सा वह खेल के मैदान में निकालता है।रेस में वह इंटरनेशनल चैंपियन बन जाता है।पान का मामा चंबल का डाकू रहता है जिसके बारे में अपने सीनियर को बताता है। सीनियर उसके मामा को डाकू कहता है तो पान सिंह तोमर कहता है कि वो डाकू नहीं  बागी हैं।"बीहड़ में बागी होते हैं ,डाकू तो संसद में होते हैं"।पान सिंह तोमर रिटायर कर जाता है।

उसका चाचा भंवर सिंह पान की फसलें काट लेता है जबकि बीज, खेत व मेहनत पान सिंह तोमर की रहती है।पान इसकी शिकायत थाना में करता है किंतु कोई भी इसकी शिकायत सुनने को तैयार नहीं है। भंवर सिंह का जुल्म बढ़ने लगता है।मजबूरी में पान सिंह तोमर को बागी बनना पड़ता है।आगे क्या होता है इसके लिए आपको फ़िल्म देखनी चाहिए।

शौक से कोई बागी नाहीं बनत है साहब' जैसे संवाद आपको हमेशा याद रहेगा।इस फ़िल्म के माध्यम से ये दिखाने का प्रयास किया गया है कि प्रशासन पहले लाचार की मदद नहीं करता है  लेकिन वही जब हथियार उठा लेता है तब प्रशासन उसके पीछे पड़ जाता है। जब पान सिंह तोमर इंटरनेशनल चैंपियन बनता है तो कोई नहीं जानता है लेकिन वही जब बागी बन जाता है तो बच्चा बच्चा उसका नाम जान जाता है।उस समय भारत में खेल के दुर्दशा पर भी ध्यान दिलाने का प्रयास किया गया है। इरफान खान का रेस देखते बनता है वहीं उसके संवाद में जो गंभीरता व ठहराव है वह काबिले तारीफ़ है। एक दो दृश्य थोड़ा असहज करते हैं जब वह अपनी पत्नी से मिलता है किंतु अश्लीलता दूर रखते हुए फिल्माया गया है।फ़िल्म का लोकेशन व संवाद कमाल का है।यह फ़िल्म एंटरटेनमेंट के साथ साथ सरकारी तंत्र की खामी को उजागर करती है। पूरी फ़िल्म में आपको कोई भी ऐसा दृश्य नहीं देखने को मिलेगा जिसमें आपको बोरियत महसूस होता हो।इरफान खान की एक्टिंग पूरी फिल्म में बांधे रखती है।

1 अक्टूबर 1980 को पान सिंह तोमर जिंदगी की जंग हार जाता है।यह कहानी सच्ची घटना पर आधारित है।इस कहानी के असली नायक इरफान खान भी 29 अप्रैल 2020 को जिंदगी का असली रेस हमेशा हमेशा के लिए हार जाते हैं।

इस महान कलाकार व बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति को भावभीनी श्रद्धांजलि।
..................
समीक्षक-अमीर हमज़ा
समीक्षक का ईमेल nirnay121@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@gmail.com

अमीर हमज़ा

Saturday, 25 April 2020

जरा चैन मिल जाए / अन्नपूर्णा श्रीवास्तव की कविताएँ

जरा चैन मिल जाए


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 खुशियाँ हुई हैं गुमशुदा, कोई ढूँढ कर लाए,
 जब दर्द का हो इन्तहां दिल कैसे मुस्काए। 

खामोश लब पै बात कोई, आकर ठहर गई
 गैरों से दिल का दर्द कोई कैसे बतलाए। 

नश्तरों से था जो घायल, भर गया वह जख्म,
अल्फ़ाज से जख्मी हुआ, दिल कैसे भर पाए।

जानना चाहो जो दिल के टूटने का हाल,
 दरके हुए शीशे से कह दो, हाल समझाए!
 सैकड़ों टुकड़े हुआ जो, आइना-ए-दिल,
 मत समेटो यार कोई किर्च चुभ जाए!
 ऐ अज़ल सोने दो मुझको, आगोश में अपनी,
 थक गयी है 'अनु'  बहुत, जरा चैन मिल जाए!
.....



     वक्त
           
 यह दुनिया अजब - अनोखी है
 जिस शख्स को चलना आता है
मौसम के बदलते तेवर पर
उन्हें खुद को बदलना आता है।

यहाँ कदम-कदम पर छलनेवाले
बहुरूपिये, बेगैरत हैं
 उसपर न उनकी दाल गले
जिन्हें बच के निकलना आता है!

जिन्हें छीन के लेना आता है
 वे ही पाते हैं हक अपना
हक माँग के जो लेना चाहे
हक छोड़ के चलना आता है!

जो संभल- संभल के चलते हैं
मिलते न कभी वे गर्दिश में
 तारीफ मगर उस इंसान की
 जिन्हें गिर के संभलना आता है।

यह वक्त बड़ा बलशाली है
कब किसको बनाए- मिटाये यह
 पा सकते वे ही मंजिल को
जिन्हें वक्त पर चलना आता है.
.......

कवयित्री - डॉ अन्नपूर्णा श्रीवास्तव
कवयित्री का ईमेल -  annpurnashrivastava1@gmail.com
कवयित्री का पता - पटना
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल - editorbejodindia@gmail.com


Monday, 13 April 2020

विज्ञान व्रत के कविता संग्रह" मैं जहाँ हूँ " की समीक्षा / डॉ. विभा माधवी

"रोज़ नयी इक चाल सियासी / प्रश्न  हुआ  रोटी का  बासी"

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विज्ञान व्रत जी की पुस्तक "मैं जहाँ हूँ" से गुज़रते हुए ऐसा लगता है कि उनकी ग़ज़लों में उनके मन की आंतरिक वेदना और छटपटाहट तथा स्वयम् से की हुई बातचीत है जिसने ग़ज़ल का रूप अख़्तियार कर लिया है। जिस तरह "महादेवी वर्मा" जी की अधिकतर रचनाएँ उनके अज्ञात - अगोचर प्रियतम को समर्पित थीं, उसी तरह इनकी ग़ज़लें भी किन्हीं 'ख़ास' को समर्पित हैं। इनकी अंतरात्मा की उस 'ख़ास' से बातचीत ही ग़ज़लों के स्वरूप में ढलकर और पुस्तकाकार होकर पाठकों के हाथों में आई है। पाठक इनकी ग़ज़लों को पढ़ते हुए इनके मन की पीड़ा से व्यथित भी होते हैं और इनकी वेदना से साझेदारी भी करते हैं। उस 'ख़ास' से न मिल पाने की पीड़ा से विज्ञान व्रत दुखी भी होते हैं और मिलन की कल्पना से प्रफुल्लित भी ! छोटी बहर में बड़ी से बड़ी बात बहुत सहजता से कह देना विज्ञान व्रत जी की ख़ासियत है। इनकी ग़ज़लें सीधे अंतरात्मा से निकल कर पाठकों के मन की गहराइयों को छूती हैं। आम बोल-चाल की भाषा  को ग़ज़ल के पैकर में ढाल देना विज्ञान व्रत जी की विशेषता है। इनके कुछ अश्आर देखते हैं:-

"बात    कराओ   मम्मी  से
हाँ, कह  दो  मैं फ़ोन  पे हूँ

हाँ जी! सब ठीक तो है ना!
बस मन था कुछ बात करूँ

काम   बचा   है  थोड़ा  सा
बस  आने   ही   वाला   हूँ "

राम का वनवास तो चौदह वर्ष का ही था परंतु सीता? सीता तो आजीवन वन में रहीं ! अग्निपरीक्षा देने के बाद भी उसे महलों में जगह नहीं मिली!
"राम अयोध्या लौट गए
सीता  को बनवास रहा"

कुछ ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़लों के  मतले देखते हैं ---
"टूट कर भी सच कहा
आइना    है    आइना"
जी हाँ ! आइना आइना ही होता है चाहे वह कितने टुकड़ों में ही क्यों न बँट जाये वो सच ही दिखलाता है !
      
जिंदगी कभी सीधी राह नहीं चलती। वह तो हर किसी को अपनी उँगलियों के इशारों पर कठपुतली की तरह नचाती रहती है !
"ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा
आज तक उलझा हुआ"

ग़ज़लकार की अनुभूति के कुछ अन्तरंग पल इन अश्आर में देखने योग्य हैं ---
"क्या कहना उस लम्हे का
जब  वो पहली बार मिला
जब से उसका साथ मिला
क्या  मैं  अपने  साथ  रहा
बस उसको महसूस किया 
मुझ  को ये ही काम जँचा"

विज्ञान व्रत जी के सारे सर्जन का मूल ग़ज़ल के इन अश्आर में मिलता है --
"आप को जब से मिला हूँ
बस  तभी  से  लापता  हूँ
आज तक उलझा हुआ हूँ
एक   ऐसा   फ़लसफ़ा  हूँ
हादसों   से   क्या  डरूँगा
हादसों   से   ही  बना   हूँ "
इसी 'लापता अवस्था' में विज्ञान व्रत जी एक के बाद एक ग़ज़ल की कई पुस्तकों का सर्जन कर चुके हैं।

ये ज़िंदगी भी एक पहेली की तरह है। कब रेत की दीवार की तरह ढह जाए किसी को कुछ पता नहीं। ज़िंदगी में बड़ी-बड़ी आँधियाँ आती रहती हैं जो ज़िंदगी के मीनार की जड़ें हिला जाएँ !
"रेत  की  दीवार  जैसी   ज़िंदगी
मौत  के  आसार  जैसी ज़िंदगी
आँधियों का जोर तो देखो ज़रा
हिल  गयी मीनार जैसी ज़िंदगी"

बेटियों से हर घर की रौनक़ और हर आँगन की ख़ुशियाँ हैं। बेटियाँ ही जीवन का श्रृंगार हैं तथा बेटियों से ही घर की बया गुलज़ार है ! माता-पिता की धड़कनें हैं बेटियाँ !
"जीवन   का  श्रृंगार  है   बेटी
इक  सपना  साकार  है  बेटी
भौरों   की   गुंजार   है   बेटी
कलियों का अभिसार है बेटी"

जीवन के यथार्थ को दर्शाते ये अश्आर ---
जो झरेगा
वो मिटेगा
जो मिटेगा
वो  उगेगा

ये जिंदगी समुद्र में एक जलयान की तरह है जिसे न जाने कब तूफ़ान का कौन सा थपेड़ा सहन करना पड़ जाए !
"सिंधु में जलयान भी है
साथ  ही  तूफ़ान भी है"

आज़ादी के बाद से ही रोटी एक अहम प्रश्न बना हुआ है। जिस मुद्दे को लेकर हमेशा नई-नई सियासी चालें चली जाती रहीं, रही हैं और रहेंगी वह मुद्दा हमेशा ज़िन्दा रहेगा वोट बैंक की ख़ातिर !
"रोज़ नयी इक चाल सियासी
प्रश्न  हुआ  रोटी का  बासी"

ग़ज़लों की दुनिया में खोये हुए विज्ञान व्रत जी ख़ुद को ग़ज़लों में ढूँढ़ रहे हैं --
" सामने   बैठा  हुआ   हूँ
  और खुद को  ढूँढ़ता हूँ "

और अंत में इनकी ग़ज़लों की मायावी दुनिया में पाठकों पर कहीं जादूटोना न हो जाए इसलिए सावधान ! कहीं पाठक पुस्तक की ग़ज़लों की ख़ुशबू से मदहोश न हो जाएँ ! इसलिए आदरणीय विज्ञान व्रत जी की ग़ज़लों से गुज़रते हुए थोड़ा सावधान और सतर्क रहें !
"मुझ   पर  कर  दो  जादू-टोना
एक   नज़र   ऐसे    देखो   ना
बादल  हो  तुम  या  ख़ुशबू हो
बरसो खुलकर  या  बिखरो ना"

कृति:- " मैं जहाँ हूँ "
कृतिकार:- विज्ञान व्रत
समीक्षक:- डॉ० विभा माधवी
प्रकाशक:- अयन प्रकाशन
संस्करण-2015
मूल्य:- 220 ₹, द्वितीय संस्करण
पृष्ठ:- 108
..................

समीक्षक - डॉ० विभा माधवी
समीक्षक का ईमेल - bibha.madhawi@gmail.com
र्पतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल - editorbejodindia@gmail.com

Saturday, 11 April 2020

इस क्रूर समय में भी / कवयित्री - रश्मि सक्सेना

कविता 

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कोरोना काल जैसे भयावने समय में भी आशावादिता को जिंदा रखनेवाली होती हैं स्त्रियाँ, उनके प्यार में सँवरे हुए बच्चे और उनकी ढाढसों  में अपनी शक्ति बटोर रहा पुरुष. पढ़िए इस कविता को जो इस काल की भी है और सार्वकालिक भी. (-सम्पादक)



इस क्रूर समय में भी 

एक स्त्री बना और सुखा रही है
घर की छत पर धूप में बैठी
पापड़, अचार, बड़िया

बच्चे बड़े मनोयोग से जोड़कर
रख रहें हैं
अपने कुछ टूटे हुए
खिलौने 

एक पुरुष ने
रोप दिया एक नन्हा पौधा
एक बड़े गमले मे

ये सभी मिलकर
जमा कर रहें हैं उदास दिनों की
गुल्लक में
अपने अपने हिस्से की आस

उम्मीद 
बुरे समय की 
भाषा के शब्दकोश में
डरावने विषाणु से कहीं अधिक
बड़ा और ताकतवर
शब्द है.
.......
कवयित्री - रश्मि सक्सेना
कवयित्री का ईमेल - saxenarashmi0912@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल- editorbejodindia@gmail.com
कविता के ऊपर दी गई टिप्पणी हेमन्त दास 'हिम' के हैं.

Thursday, 13 February 2020

*वैलेंटाइन डे पर विशेष* - नये जमाने का वेलेटाइन/ अलका पाण्डेय

 आज “आई लव यू”.....कल “आई हेट यू”

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सच्चे प्यार का मतलब तो पता नहीं बस वैलेंटाइन मनाने की होड़ करते देखे जाते है
आज की यंग जनरेशन को 14 फरवरी का, जिस बेसब्री से इंतज़ार रहता है, उतनी बेताबी शायद किसी और दिन के लिए नहीं होती। प्रेम का उत्सव, प्यार का त्योहार  वैलेंटाइन डे क्या वाक़ई सच्चे प्यार के सेलिब्रेशन का दिन है? आज के दौर में जब लड़के-लड़कियां कपड़ों की तरह गर्लफ्रेंड और ब्वॉयफ्रेंड बदलते हैं। इस साल जिसके साथ वैलेंटाइन डे मना रहे हैं, अगले साल तक उनका ये वैलेंटाइन न जाने कितनी बार बदल चुका होता है, जो रिश्ता जोड़ने से पहले दिल और इमोशन की बजाय सामने वाले की पॉकेट और बैंक अकाउंट खंगालते हैं। क्या ऐसे लोगों से सच्चे प्यार की उम्मीद की जा सकती हैं, क्या इन्हें प्यार के सही मायने भी पता होते हैं?

यकीनन इनके लिए तो तीन अक्षरों ‘आई लव यू’ से शुरू हुआ प्यार तीन अल्फाजों ‘आई हेट यू’ पर खत्म भी हो जाता है। ये ठीक है कि लोकतांत्रिक देश में हर किसी को अपनी मर्ज़ी से जीने का, पर्व/त्योहार मनाने का हक़ है, मगर क्या प्यार के नाम पर गुमराह होती युवा पीढ़ी को रोका नहीं जाना चाहिए?  कॉलेज तो छोड़िए अब तो स्कूली बच्चे भी वैलेंटाइन डे मनाने लगे हैं. हम और आप जिस उम्र में किताबें और खेल-कूद की दुनिया से इतर कुछ सोच ही नहीं पातें थे, उसी उम्र में आज के बच्चे इश्क की बातें कर रहे हैं, पढ़ाई और करियर से ध्यान भटकर गर्लफ्रेंड/बॉयफ्रेंड को मनाने के तरी़के ढूंढ़ने में व्यस्त है, क्या ये चिंता का विषय नहीं?

प्यार तो दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत एहसास होता है, जो दो दिलों में होता है और ये भी जरूरी नहीं कि ये प्यार सिर्फ पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका का हो। प्यार तो हर रूप में पावन होता है फिर चाहे वो भाई-बहन का हो, मां-बेटे का या पिता-बेटी का। यदि कोई वाक़ई प्रेम का उत्सव मनाना चाहे, तो उसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन पश्‍चिम के इस त्योहार के नाम पर जो सेलिब्रेशन होता है क्या प्यार की परिभाषा इतनी ही सीमित है।

लड़के-लड़कियों को मिलना एक-दूसरे को गले लगाना, किस करना, डेट पर जाना, गिफ्ट का लेन-देन और थोड़ा ज़्यादा मॉर्डन हो गए, तो एक क़दम आगे बढ़ते हुए हमबिस्तर हो जाना। इस मॉर्डन लव में प्यार का कोई नामोंनिशान नहीं होता, कोई कोमल भावना नहीं होती, कोई एहसास नहीं होता है। यदि कुछ होता है तो बस आकर्षण, वासना और टाइम पास के लिए एक साथी। हां, सौ में से एक जोड़ा भले ही सच्चा प्रेमी हो सकता है। वैसे भी क्या प्यार के इज़हार के लिए कोई एक दिन मुकर्र किया जा सकता है। प्यार तो कभी भी किसी से भी हो सकता है, वो दिन, समय, तारीख़ नहीं देखता, तो उसके इज़हार के नाम पर इस दिखावे की क्या ज़रूरत?

हमारे देश में जहां राधा-कृष्ण पवित्र प्रेम का प्रतीक माने जाते है, मीरा के निःस्वार्थ प्रेम की मिसाल दी जाती है, वहां प्यार के इज़हार के किसी विशेष दिन या ता.  की क्या ज़रूरत? जिस पश्‍चिमी संस्कृति का अनुकरण कर हम इस त्योहार को इतने जोश से मनाते हैं, इसे प्यार का पर्व कहते हैं, क्या कभी सोचा आपने कि यदि वहां इतना ही प्यार होता, तो क्यों कोई पति/पत्नी एक ही हमसफ़र के साथ ज़िंदगी भर नहीं रह पाते, क्यों एक बच्चे के कई माता/पिता होते हैं? कई बार तो बच्चे को ये भी पता नहीं चल पाता कि उसका असली पिता कौन है?
हमें हमारी संस्कृति नहीं समझ आती क्यो की उस में प्यार के मायने त्याग , समर्पण , अटूट विश्वास , आस्था , जीवन पर्यन्त का रिश्ता बताया गया ।

माना कि ज़माना बदल गया है अब ख़ामोश रहकर स़िर्फ आंखों के इशारों से इश्क का इज़हार नहीं किया जाता, लेकिन इसका ये मतलब भी तो नहीं कि खुलेआम का प्यार का दिखावा किया जाए। युवाओं के लिए इस ख़ास दिन से किसी का फ़ायदा हो न हो, मगर बाज़ार को फायदा ज़रूरत होता है, जो उनके इस कथित प्रेम को जी भरकर भुनाता है। कार्ड और गिफ्ट्स की भरमार के साथ ही अब तो रेस्टोरेंट, थिएटर आदि में उस दिन स्पेशल ऑफर भी दिया जाता है। कई कंपनियां भी युवाओं को आकर्षित करने के लिए वैलेंटाइन डे के लिए अपने प्रोडक्ट के साथ स्पेशल ऑफर देती है और लोग इस छूट का फ़ायदा उठाते हुए जुट जाते हैं अपने प्रेमी/प्रेमिका को ख़ुश करने में।

यह एक दिन मनाने उपहार देने का दिन नहीं होकर एक वचन दे की हम एक दूसरे के सुख दुख में साथ निभायेगे , एक दूसरे के परिवार की इज़्ज़त करेंगे , शादी
के पवित्र बंधन में बंध कर आजीवन साथ निभायेंगे ।

 वैसे बाज़ारवाद के इस दौर में जब रिश्ते-नाते सबके मायने ही बदल गए हैं, तो भला प्यार कैसे न बदले ?
अरे प्यार या भावनाऐ क्या बदलने की चीज़ है

आधुनिकता के नाम पर जो न हो वह कम है ....
वैलेंटाइन मनाये परन्तु इस दिन दिमाग ठिकाने पर रखने का होता है। दूसरों को देखकर होश न खो दें, रिलेशनशिप को पकने के लिए थोड़ा समय दें। यकीन कीजिए आप वेलेंटाइन डे का बुखार उतरने के बाद दूसरे दिन ज्यादा खुश हो उठेंगे क्योंकि आपने संयम रखा और भावना के बहाव पर लगाम कसे रखी जो जीवन में बहुत जरुरी है।

कहावत है ...जोश से नही होश से रिश्तो की परवरिश करे
.................

लेखिका - डॉ अलका पाण्डेय
लेखिका का ईमेल - lalkapandey74@gmail.com
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