Thursday, 13 February 2020

*वैलेंटाइन डे पर विशेष* - नये जमाने का वेलेटाइन/ अलका पाण्डेय

 आज “आई लव यू”.....कल “आई हेट यू”

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सच्चे प्यार का मतलब तो पता नहीं बस वैलेंटाइन मनाने की होड़ करते देखे जाते है
आज की यंग जनरेशन को 14 फरवरी का, जिस बेसब्री से इंतज़ार रहता है, उतनी बेताबी शायद किसी और दिन के लिए नहीं होती। प्रेम का उत्सव, प्यार का त्योहार  वैलेंटाइन डे क्या वाक़ई सच्चे प्यार के सेलिब्रेशन का दिन है? आज के दौर में जब लड़के-लड़कियां कपड़ों की तरह गर्लफ्रेंड और ब्वॉयफ्रेंड बदलते हैं। इस साल जिसके साथ वैलेंटाइन डे मना रहे हैं, अगले साल तक उनका ये वैलेंटाइन न जाने कितनी बार बदल चुका होता है, जो रिश्ता जोड़ने से पहले दिल और इमोशन की बजाय सामने वाले की पॉकेट और बैंक अकाउंट खंगालते हैं। क्या ऐसे लोगों से सच्चे प्यार की उम्मीद की जा सकती हैं, क्या इन्हें प्यार के सही मायने भी पता होते हैं?

यकीनन इनके लिए तो तीन अक्षरों ‘आई लव यू’ से शुरू हुआ प्यार तीन अल्फाजों ‘आई हेट यू’ पर खत्म भी हो जाता है। ये ठीक है कि लोकतांत्रिक देश में हर किसी को अपनी मर्ज़ी से जीने का, पर्व/त्योहार मनाने का हक़ है, मगर क्या प्यार के नाम पर गुमराह होती युवा पीढ़ी को रोका नहीं जाना चाहिए?  कॉलेज तो छोड़िए अब तो स्कूली बच्चे भी वैलेंटाइन डे मनाने लगे हैं. हम और आप जिस उम्र में किताबें और खेल-कूद की दुनिया से इतर कुछ सोच ही नहीं पातें थे, उसी उम्र में आज के बच्चे इश्क की बातें कर रहे हैं, पढ़ाई और करियर से ध्यान भटकर गर्लफ्रेंड/बॉयफ्रेंड को मनाने के तरी़के ढूंढ़ने में व्यस्त है, क्या ये चिंता का विषय नहीं?

प्यार तो दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत एहसास होता है, जो दो दिलों में होता है और ये भी जरूरी नहीं कि ये प्यार सिर्फ पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका का हो। प्यार तो हर रूप में पावन होता है फिर चाहे वो भाई-बहन का हो, मां-बेटे का या पिता-बेटी का। यदि कोई वाक़ई प्रेम का उत्सव मनाना चाहे, तो उसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन पश्‍चिम के इस त्योहार के नाम पर जो सेलिब्रेशन होता है क्या प्यार की परिभाषा इतनी ही सीमित है।

लड़के-लड़कियों को मिलना एक-दूसरे को गले लगाना, किस करना, डेट पर जाना, गिफ्ट का लेन-देन और थोड़ा ज़्यादा मॉर्डन हो गए, तो एक क़दम आगे बढ़ते हुए हमबिस्तर हो जाना। इस मॉर्डन लव में प्यार का कोई नामोंनिशान नहीं होता, कोई कोमल भावना नहीं होती, कोई एहसास नहीं होता है। यदि कुछ होता है तो बस आकर्षण, वासना और टाइम पास के लिए एक साथी। हां, सौ में से एक जोड़ा भले ही सच्चा प्रेमी हो सकता है। वैसे भी क्या प्यार के इज़हार के लिए कोई एक दिन मुकर्र किया जा सकता है। प्यार तो कभी भी किसी से भी हो सकता है, वो दिन, समय, तारीख़ नहीं देखता, तो उसके इज़हार के नाम पर इस दिखावे की क्या ज़रूरत?

हमारे देश में जहां राधा-कृष्ण पवित्र प्रेम का प्रतीक माने जाते है, मीरा के निःस्वार्थ प्रेम की मिसाल दी जाती है, वहां प्यार के इज़हार के किसी विशेष दिन या ता.  की क्या ज़रूरत? जिस पश्‍चिमी संस्कृति का अनुकरण कर हम इस त्योहार को इतने जोश से मनाते हैं, इसे प्यार का पर्व कहते हैं, क्या कभी सोचा आपने कि यदि वहां इतना ही प्यार होता, तो क्यों कोई पति/पत्नी एक ही हमसफ़र के साथ ज़िंदगी भर नहीं रह पाते, क्यों एक बच्चे के कई माता/पिता होते हैं? कई बार तो बच्चे को ये भी पता नहीं चल पाता कि उसका असली पिता कौन है?
हमें हमारी संस्कृति नहीं समझ आती क्यो की उस में प्यार के मायने त्याग , समर्पण , अटूट विश्वास , आस्था , जीवन पर्यन्त का रिश्ता बताया गया ।

माना कि ज़माना बदल गया है अब ख़ामोश रहकर स़िर्फ आंखों के इशारों से इश्क का इज़हार नहीं किया जाता, लेकिन इसका ये मतलब भी तो नहीं कि खुलेआम का प्यार का दिखावा किया जाए। युवाओं के लिए इस ख़ास दिन से किसी का फ़ायदा हो न हो, मगर बाज़ार को फायदा ज़रूरत होता है, जो उनके इस कथित प्रेम को जी भरकर भुनाता है। कार्ड और गिफ्ट्स की भरमार के साथ ही अब तो रेस्टोरेंट, थिएटर आदि में उस दिन स्पेशल ऑफर भी दिया जाता है। कई कंपनियां भी युवाओं को आकर्षित करने के लिए वैलेंटाइन डे के लिए अपने प्रोडक्ट के साथ स्पेशल ऑफर देती है और लोग इस छूट का फ़ायदा उठाते हुए जुट जाते हैं अपने प्रेमी/प्रेमिका को ख़ुश करने में।

यह एक दिन मनाने उपहार देने का दिन नहीं होकर एक वचन दे की हम एक दूसरे के सुख दुख में साथ निभायेगे , एक दूसरे के परिवार की इज़्ज़त करेंगे , शादी
के पवित्र बंधन में बंध कर आजीवन साथ निभायेंगे ।

 वैसे बाज़ारवाद के इस दौर में जब रिश्ते-नाते सबके मायने ही बदल गए हैं, तो भला प्यार कैसे न बदले ?
अरे प्यार या भावनाऐ क्या बदलने की चीज़ है

आधुनिकता के नाम पर जो न हो वह कम है ....
वैलेंटाइन मनाये परन्तु इस दिन दिमाग ठिकाने पर रखने का होता है। दूसरों को देखकर होश न खो दें, रिलेशनशिप को पकने के लिए थोड़ा समय दें। यकीन कीजिए आप वेलेंटाइन डे का बुखार उतरने के बाद दूसरे दिन ज्यादा खुश हो उठेंगे क्योंकि आपने संयम रखा और भावना के बहाव पर लगाम कसे रखी जो जीवन में बहुत जरुरी है।

कहावत है ...जोश से नही होश से रिश्तो की परवरिश करे
.................

लेखिका - डॉ अलका पाण्डेय
लेखिका का ईमेल - lalkapandey74@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल - editorbejodindia@gmail.com

Monday, 10 February 2020

आलिंगन में परिणीता (वसंत ऋतु पर कविता) / सुमन यादव

कविता

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रंग गई पग-पग धरा 
चहुँ ओर जग विस्मृत भरा
ललित, हरित, उज्वलित
कीर्तिमती हुई दिशा

गूंज उठी, मधुर ध्वनि
कल-कल तरंग, नवल प्रसंग
स्वर्ण स्वरूप, प्रकाशयुक्त
सुशोभिनी वसुंधरा

रति श्रृंगार धार धारित
निसर्ग यौवन पर खड़ा 
प्रतीत प्राण राग-रंग 
मदिर प्रेमाराधना

विहंग वृंद, जन समूह
पलाश पुष्प, हार गूंथ 
उदित स्वर्णिम ऋतु वसंत
 आलिंगन में परिणीता।
.....

नाम - सुमन यादव
कवयित्री का ईमेल - sumankyadav6@gmail.com
परिचय - कवयित्री मुम्बई में शिक्षिका हैं और एक युवा कवयित्री हैं. पहले भी इनकी कविता इस ब्लॉग में प्रकाशित हो चुकी है. 
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Saturday, 8 February 2020

सैनिकों की संगिनियाँ / कवयित्री - सीमा सिंह

कविता

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'शहीद' शब्द के आँखों से 
गुज़रने की आहट से ही
पलट देती हूँ अखबार के पन्ने
स्क्रोल कर देती हूँ  फेसबुक की पोस्ट अपडेट
बदल देती हूँ चैनल टीवी की
क्लोज़ कर देती हूँ फ़ाइल
ट्विटर की
लॉग ऑउट होना चाहती हूँ उन तमाम
सुर्खियों-दलीलों-खबरों से

जो भय दिखाती 
आगाह करती हैं,
अभी-अभी ब्याही है
सीमा के पहरेदार से...

सज़दे में शीश नवा
दुवाओं मन्नतों की ताबीज़ से
विश्वास को और मजबूत करके भी
खुद एक सवाल संग
उलझी रहती हूँ..

सरज़मीं के लिए वो भी तो
सर्वस्व न्योछावर करती हैं
ब्याह में सिंदूरदान की रस्म निभा
युद्ध में सिंदूर दान कर देती हैं
रिश्तों की रिक्तता भरती रहती
स्वयं शून्य होती जाती हैं
ये सैनिकों की संगिनियाँ 
  इतना धैर्य कहाँ से पाती हैं!
.....

कवयित्री -सीमा जितेंद्र सिंह
परिचय - पीएच.डी.(हिंदी) शोधार्थी
मुंबई विश्वविद्यालय

Friday, 31 January 2020

उम्मीद / कवयित्री - रश्मि सक्सेना

कविता

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समय की सड़क पर
चलते चलते घिस चुके हैं
उसके पैरों के तलवे
हताशा उसके चेहरे पर
सूख चुके आँसुओं के बीच
कहीं गहरे पैठ कर गयी है

बसंत का एक भी
पीला फूल उसके जीवन में
नहीं खिला 
दुःख पीले ज़र्द पत्तों की भांति
बिना पतझड़ के भी
झरते रहते हृदय के
आँगन में 

नदी में गिरी 
उसकी कुल्हाड़ी मात्र
लोहा भर नहीं थी
उसकी जीवन और मृत्यु के बीच की
एक मात्र कड़ी थी

प्रतीक्षा की देहरी पर
बैठे हुए वर्षों बीत गये उसे
न नदी का पानी घटा 
न ही कोई देवी अथवा देवता
हाथ में कुल्हाड़ी पकड़े
बाहर आया अब तक

आम आदमी की
कुल्हाड़ी गिरने का दुःख
देवताओं को 
समझ नहीं आया कभी
इसके लिए उन्हें मनुष्य होना था.
....

कवयित्री - रश्मि सक्सेना
कवयित्री का ईमेल - saxenarashmi0912@gmail.com
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Sunday, 26 January 2020

लहराता है तिरंगा / कवि - लक्ष्मीकांत मुकुल

कविता

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नीले  आकाश में
लहराता है तिरंगा
जैसे थिरकते हैं हवा में गुलमोहर के फूल
बच्चों के चेहरे पर  उमगती हैं लहरें
जब नन्हें हाथों में तिरंगा थामें
प्रभात फेरियां करते हैं गलियों में

तिरंगा उड़ता है पवन के सरसराहट के बीच
उसके रंग छू जाते हैं हमारे दिलों की गहराई को
ढाक- फूलों - सा केसरिया
हमें देता है पथरीली राहों से जूझने का कौशल
सारस की धवल पंख जैसा उजला
देता है जीवन में स्वच्छता के संदेश
हरा रंग भरता है सदाबहार हरीतिमा के गुण
जिसके बीच खुशहाल रहता है हमारा जीवन
चक्र देता है अंधेरे युग में भी कदम बढ़ाने की सीख

बोध जगाता है तिरंगा
सूखी चट्टान पर पौधे उगाने का अधिकार
बादल की तरह झुक झुक कर बरसने का कर्तव्य
वृक्ष लताओं वाले बाग- सा सहमेल

आसमान में उड़ते बादल
पत्तियों पर जमी ओस की बूंदे
नदी- धाराओं से उभरता संगीत
गुपचुप थिरकते हैं लहराते झंडे की धुनों पर
मानो थिरक रही हो करोड़ों जन - गण की धड़कनें
समवेत स्वर में तिरंगा के साथ!
....
कवि - लक्ष्मीकान्त मुकुल
गीतकार का ईमेल - kvimukul12111@gmail.com
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Wednesday, 8 January 2020

सब लोग रहें मिल भारत में / कवि - कैलाश झा किंकर

मदिरा सवैया छंद

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(1)
आँगन हास -विलास रहे,
नित नैनन में शुभ प्यार दिखे।
नेह रहे सबका सब पे ,
तब सुन्दर सा घर-द्वार दिखे।।
जीवन जान जहान सभी,
पर साँझ-बिहान बहार दिखे ।
'किंकर' धन्य हुआ अब तो ,
घर सुन्दर- सा परिवार दिखे।

(2)
पास-पड़ोस रहे खुशियाँ,
खुशहाल समाज हँसे दिल से।
लक्ष्य मिले सबको नित ही,
सब तुष्ट दिखे निज मंज़िल से।।
काम करें अपना- अपना,
सब लोग लगें अब काबिल से ।
'किंकर' बाग सुबाग बने,
अब ध्वंश न हो बड़वानिल से।

(3)
देश नहीं परदेश लगे,
सब लोग रहें मिल भारत में ।
रोज खिले सब फूल यहाँ,
गमकें हरसू खिल भारत मेंं।
आपस में लड़ना न सखे,
रखना अपना दिल भारत में।
'किंकर 'याद रहे इतना,
रहते हम शामिल भारत में।।


(4)
झील, पहाड़, नदी, नद से,
यह भारत देश मनोहर है।
पूरब, पश्चिम, दक्षिण में,
नित सागर सैन्य धरोहर है।।
उत्तर में गिरिराज खड़ा,
जिसका यह देश सहोदर है।
'किंकर ' छ: ऋतुएँ जब हैं,
हर ओर खिला गुलमोहर है ।।
.....
कवि - कैलाश झा किंकर
कवि का ईमेल - kailashjhakinkar@gmail.com
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Sunday, 5 January 2020

Some pics of Fifth of Jan 2020- ITM Kavyotsava (Navi Mumbai)

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नोट - 1. अभी  पाठकों की सेवा में आईटीएम काव्योत्सव, खारघर की 105वीं गोष्ठी के कुछ चित्र मात्र दिए जा रहे हैं.  कुछ घंटों बाद पूरी रपट अलग चित्रों के साथ बेजोड़ इंडिया ब्लॉग के मुख्य पेज (https://bejodindia.blogspot.com/)  पर प्रकाशित की जाएगी. 
2. कृपया ध्यान रखें कि इस पेज (Photo+ पेज) का लिंक तो फेसबुक अपने वाल पर लेता है पर बेजोड़ इंडिया ब्लॉग के मुख्य पेज का लिंक पिछले 6 महीनों से नहीं ले रहा है. अत: उस पोस्ट के लिंक को व्हाट्सएप्प पर शेयर कर सकते हैं.
नववर्ष की शुभकामनाएँ! - संपादक (ईमेल - editorbejodindia@gmail.com)